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  • पूंजीवाद में कानूनी लूट

    Date:21 Dec 2017

    बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अततः अदालत का फैसला आ गया। अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। आरोपियों में ए.राजा और कानीमोझी जैसे बड़े नेता थे तो अनिल अंबानी की कंपनी के बड़े अधिकारी भी। न्यायाधीश ने बहुत कड़े शब्दों में फैसला सुनाया और सी.बी.आई. को कटघरे में खड़ा किया। कम से कम इस मामले में सी.बी.आई. पर स्वतः लापरवाही का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उ बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अततः अदालत का फैसला आ गया। अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। आरोपियों में ए.राजा और कानीमोझी जैसे बड़े नेता थे तो अनिल अंबानी की कंपनी के बड़े अधिकारी भी। न्यायाधीश ने बहुत कड़े शब्दों में फैसला सुनाया और सी.बी.आई. को कटघरे में खड़ा किया। कम से कम इस मामले में सी.बी.आई. पर स्वतः लापरवाही का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उसे नियंत्रित करने वाली वर्तमान सरकार का पूरा हित था इसमें। कुछ समय पहले यदि करुणानिधि की मोदी से दोस्ताना मुलाकात में कुछ छिपा हो तो आश्चर्य नहीं कहा जा सकता। फैसले के पीछे इस तरह के घपले हों या न हों, एक बात पर जरा भी शक नहीं है। मामला चाहे टू जी स्पेक्ट्रम का हो या कोयला घोटाले का, यह किसी आपराधिक घोटाले का मामला नहीं है। इन दोनों में सरकार के फैसलों को रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था कि सरकार को नीतिगत फैसले करने का अधिकार है। यह अलग बात है कि इस घोषणा के बाद उसने सरकार को निर्देश दिया कि वह फिर से नीलामी के जरिये स्पेक्ट्रम या कोयला खानों का आवंटन करे। कोयला घोटाले में कुछ अफसरों को सजा भी हुई तो किसी नीतिगत फैसले के लिए नहीं बल्कि किन्हीं विशिष्ट खानों के आवंटन में पक्षपात के लिए। यहां तक कि भाजपाई भी कहते हैं कि इन घोटालों की नीतियों का निर्णय लेने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार हैं। यानी एक ईमानदार व्यक्ति ने बेईमानों के लिए नीतिगत निर्णय लिया। असल में स्पेक्ट्रम या कोयला घोटाला वह कानूनी लूट है जो उदारीकरण-निजिकरण-वैश्वीकरण के पिछले तीन-चार दशकों से धड़ल्ले से चल रही है। इसे किसी अदालत में अपराध नहीं साबित किया जा सकता। यही कानूनी लूट तो असल में बहुप्रचारित गुजरात विकास माॅडल है। यही तो पिछले सालों मे तेज विकास दर विकास के पीछे का सच है। हर तरह से पूंजीपति वर्ग की सरकार द्वारा पैसा लुटाना-यही आज का सर्वोच्च विकास है। यह स्पेक्ट्रम या कोयला खान की बिना नीलामी के आवंटन के जरिये हो सकता है, यह हर साल बजट मुकेश अंबानी के फोर जी के जरिये हो सकता है, यह हर साल बजट में पूंजीपति वर्ग को पांच-छः लाख करोड़ के प्रोत्साहन के जरिये हो सकता है इत्यादि-इत्यादि। इसमें सरकार द्वारा शिक्षा स्वास्थ्य इत्यादि में कटौती शामिल है। यह पूंजीपति वर्ग और उसकी लूट पूरी प्रचार मशीनरी की सफलता है कि वह असली और कानूनी लूट पर से ध्यान हटाकर सारा ध्यान ‘घोटालों’ और भ्रष्टाचार पर केन्द्रित कर देती है। फिर कोई बाजीगर अपनी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटते हुए पूंजीपति वर्ग की असली लूट को बढ़ाता रहता है। यहां तक कि वह इसका एक माडल ही खड़ा कर देता है जिसे वह पूरे देश के स्तर पर लागू करना चाहता है। आज आवश्यक्ता है पूंजीपति वर्ग और उसके कारकूनों की इस धोखाधड़ी को उजागार करने की।

  • मोदी की गिरती साख बचाने की जी-तोड़ कोशिश

    Date:19 Nov 2017

    संघी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय काफी संकट में हैं और भारत का पूंजीपति वर्ग ही नहीं, साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग भी उनकी रक्षा में जी-जान से आ जुटा है। पिछले महीने भर में साम्राज्यवादी संस्थाओं की ओर से कम से कम तीन रपटें मोदी की रक्षा में जारी की गई हैं। पहले बदनाम विश्व बैंक ने बताया कि भारत में व्यवसाय करने की स्थिति बेहतर हो गई है। भारत सरकार ही नहीं, समस्त भारतीय पूंजीव संघी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय काफी संकट में हैं और भारत का पूंजीपति वर्ग ही नहीं, साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग भी उनकी रक्षा में जी-जान से आ जुटा है। पिछले महीने भर में साम्राज्यवादी संस्थाओं की ओर से कम से कम तीन रपटें मोदी की रक्षा में जारी की गई हैं। पहले बदनाम विश्व बैंक ने बताया कि भारत में व्यवसाय करने की स्थिति बेहतर हो गई है। भारत सरकार ही नहीं, समस्त भारतीय पूंजीवादी प्रचार-तंत्र ने इसे मोदी सरकार की वाहवाही के रूप में प्रचारित किया इस बात को पूर्णतया छिपाते हुए कि यदि यह सच भी है तो इसका केवल यही मतलब है कि पूंजीपति वर्ग को लूट की और ज्यादा छूट मिल गई है। इसके बाद इस महीने प्यू नामक सर्वेक्षण कंपनी ने रपट जारी की कि साढ़े तीन साल सत्ता में रहने के बाद भी मोदी की लोकप्रियता बनी हुई है। तीन चौथाई से ज्यादा भारतीय उन्हें पसन्द करते हैं। बस प्यू ने यह नहीं बताया कि मोदी को पसंद करने वाले ये भारतीय आत्महत्या करते किसान, बेरोजगार मजदूर, भूखे आदिवासी हैं या तेजी से और ज्यादा अमीर होते पूंजीपति ? अंत में अभी-अभी मूडी नामक रेटिंग एजेन्सी ने भारत की उधार साख को एक स्तर बेहतर कर दिया है। यह उसने तेरह साल बाद किया। मोदी के सारे समर्थक भी इसे ले उड़े बिना इस बात की चिन्ता किये हुए कि स्वयं मोदी सरकार के कारकूनों ने इस एजेन्सी की साख पर सवाल खड़े कर रखे हैं। इसके अलावा भी पूंजीवादी प्रचारतंत्र में हर रोज दुनिया भर से खोज-खोज कर मोदी की प्रसंशा में झूठी-सच्ची खबरें प्रचारित की जा रही हैं। किसी भी साम्राज्यवादी ऐरे-गैरे द्वारा मोदी तारीफ में कहा गया कोई भी वाक्य एक बेमिसाल तमगे की तरह प्रदर्शित किया जा रहा है इन सारे संकेतों का मंतव्य स्पष्ट है। किसी भी कीमत पर मोदी और उनकी सरकार की गिरती साख को बचाना है। पिछले साढ़े तीन सालों ने बहुत धैर्यवान लोगों को भी मोदी पर सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है। राहुल गान्धी की लोकप्रियता अचानक बढ़ने लगी है। ऊपर से गुजरात चुनाव सामने हैं जिसका विकास माॅडल अब आलोचना ही नहीं मजाक का विषय बन गया है। अब इस बात की संभावना दीख रही है कि सर्किट के सारे प्रयासों के बाद भी मुन्ना भाई उर्फ फेंकू दोबारा प्रधानमंत्री न बन सके। पर मजदूर वर्ग के लिए यह कोई तसल्ली की बात नहीं होगी कि उसका स्थान बुद्धिमान बन रहा पप्पू ले ले। मजदूर वर्ग की मुक्ति तो सारे मुन्ना भाइयों - सर्किटों, सारे फेकुओं-पप्पूओं से मुक्ति में है।

  • छकड़ों और बैलगाड़ियों के देश में बुलेट ट्रेन

    Date:15 Sep 2017

    देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। गनीमत यह है कि यह उसी तरह बैलगाड़ी पर लदकर नहीं आ रही जैसे टीवी बैलगाड़ी पर लदकर गांव पहुंचता है। यह बुलेट ट्रेन जापान से आ रही है और संघी प्रधानमंत्री कें हिसाब से लगभग मुफ्त में। बस वे यह बताना भूल गये कि जापानी अपने सारे प्रयास के बावजूद अमरीकियों को यह बुलेट बेचने में नाकामयाब रहे हैं। कि जापान की बुलेट ट्रेन बनाने वाली कंपनियां आर्डन न मिलने से परे देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। गनीमत यह है कि यह उसी तरह बैलगाड़ी पर लदकर नहीं आ रही जैसे टीवी बैलगाड़ी पर लदकर गांव पहुंचता है। यह बुलेट ट्रेन जापान से आ रही है और संघी प्रधानमंत्री कें हिसाब से लगभग मुफ्त में। बस वे यह बताना भूल गये कि जापानी अपने सारे प्रयास के बावजूद अमरीकियों को यह बुलेट बेचने में नाकामयाब रहे हैं। कि जापान की बुलेट ट्रेन बनाने वाली कंपनियां आर्डन न मिलने से परेशान हैं। कि इस बुलेट ट्रेन के सारे साजो-सामान जापान से आयेंगे- दो गुने या तीन गुने दाम पर। कि यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पिछड़े देशों में व्यवसाय करने का पुराना तरीका है। कि पांच साल में यह कीमत रुपये के अवमूल्यन के कारण पांच से दस गुना बढ़ चुकी होगी। कि इस सौदे की आड़ में अन्य रक्षा सौदे किये जा रहे हैं। कि जापानी दोस्त के इस उपहार की कीमत एशिया में जापानी और अमरीकी साम्राज्यवादियों का लठैत बनकर चुकानी पड़ेगी। संघी सरकार यह सब नहीं बतायेगी और न ही इसके प्रचार में लगा पूंजीवादी प्रचारतंत्र। लेकिन इस कारण यह सच छिप नहीं सकता कि देश की 95 प्रतिशत जनता का इस बुलेट से कोई लेना-देना नहीं केवल इसी रूप में होगा कि अंततः वही इसकी कीमत चुकाएगी जबकि वह इसमें कभी यात्रा नहीं करेगी। यह कीमत इतनी है कि पुराने रेल मंत्री के अनुसार इससे पुरानी रेल पटरियां बदली जा सकती हैं या जर्जर होती जाती रेल सुरक्षा को ठीक किया जा सकता है। सरकार के पास इसके लिए पैसा नहीं है। नतीजा यह कि आये दिन रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं। इस देश की नब्बे प्रतिशत आबादी या तो खचाड़ा पैसेन्जर रेजगाड़ियों में यात्रा करती है या फिर एक्सप्रेस रेलगाड़ियों के सामान्य डिब्बे में। इनकी हालत केवल इनमें यात्रा करने वाले ही बयां कर सकते हैं। मोदी और उनकी भगवा ब्रिगेड का इनसे कोई सरोकार नहीं है। इसीलिए इन रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ाने या उनकी हालत बेहतर करने की इन्हें कोई चिन्ता नहीं है। बुलेट ट्रेन महज इसकी एक और बानगी है कि देश में असमानता कितनी तेजी से बढ़ छकड़ों और बैलगाड़ियों के इस देश में अब बुलेट ट्रेन भी चलेगी और उसकी कीमत चुकाएंगे साइकिल, छकड़े या बैलगाड़ी पर चलने वाले। भारत जैसे पिछड़े पूंजीवादी देशों के पूंजीवादी विकास का यही चरित्र है। मोदी और उनके समर्थक बुलेट ट्रेन का बाजा बजाएंगे। उनका देश तरक्की कर रहा है। पर जिनकी कीमत पर यह तरक्की हो रही है उन्हें मोदी एण्ड कंपनी समेत सारे पूंजीपति वर्ग का बैण्ड बजाने की तैयारी करनी चाहिए।

  • निजता का अधिकार: मजदूर वर्ग क्यों और कैसे जश्न मनाए ?

    Date:25 Aug 2017

    24 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। इस अधिकार का विरोध करने वाली सरकार से लेकर सारे पूंजीवादी बुद्धीजीवी इस फैसले का गुणगान कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में सब कुछ बदल जाने वाला है। मजदूर वर्ग के लिए यह सहज सा सवाल है कि संविधान में पहले से दर्ज मौलिक अधिकारों का क्या हाल है ? क्या मजदूर और एवं अन्य म 24 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। इस अधिकार का विरोध करने वाली सरकार से लेकर सारे पूंजीवादी बुद्धीजीवी इस फैसले का गुणगान कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में सब कुछ बदल जाने वाला है। मजदूर वर्ग के लिए यह सहज सा सवाल है कि संविधान में पहले से दर्ज मौलिक अधिकारों का क्या हाल है ? क्या मजदूर और एवं अन्य मेहनतकश उन मौलिक अधिकारों का जरा भी इस्तेमाल कर पा रहे हैं ? क्या एक अदना सा सरकारी अधिकारी, थाने का इंस्पेक्टर, फैक्टरी का मालिक और मकान मालिक लगातार मजदूरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करते ? क्या मजदूर इन अधिकारों को लागू करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है ? जब इस पूंजीवादी व्यवस्था में उसके जिन्दा रहने की स्थिति ही खतरे में पड़ी हुई हो तो इन मौलिक अधिकारों का क्या मतलब रह जाता है। स्पष्ट है कि यदि संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों का कोई मतलब है तो वह शासक पूंजीपति वर्ग और उसके चाकरों के लिए ही है। वे ही यह हैसियत रखते हैं कि उसे लागू करवा सकें और उल्लंघन होने र अदालत जा सकें। अंबानी-अडानी को तो वे अधिकार भी हासिल हैं जो संविधान में दर्ज नहीं हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में इससे भिन्न कुछ नहीं हो सकता है। वैसे भारत के संविधान के बारे में कहा जाता है इसमें मूल पाठ में मौलिक अधिकार घोषित करने के बाद इसे हाशिये के प्रावधानों द्वारा छीन लिया जाता है। संविधान में दर्ज सारे मौलिक अधिकार उन कानूनों के मातहत हैं जिन्हें अंग्रेजो ने यहां शासन करने के लिए बनाये थे। इसीलिए थाने का इंसपेक्टर भी पलक झपकते ही इन अधिकारों की ऐसी-तैसी कर देता है। निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करते समय भी सर्वोच्च न्यायालय ने यही कहा कि अन्य मौलिक अधिकारों की तरह ही इस पर भी प्रतिबन्ध और सीमाएं होंगी। सरकार द्वारा छेद से हाथी निकालने के लिए इतना ही पर्याप्त होगा। रही-सही कसर सरकारी अधिकारी और पुलिस वाले पूरी कर देंगे। अगर तब भी कुछ बाकी रह गया तो संघी लंपट तो हैं हीं। इसीलिए मजदूर वर्ग को निजता को मौलिक अधिकार घोषित किये जाने पर जश्न मनाने का कोई कारण नहीं दीखता। उदारीकरण के इस दौर में उसके सारे ही अधिकार निलंबित हो गये हैं। केवल उसकी संगठित ताकत और इसके बल पर संघर्ष ही उसकी स्थिति में कोई बेहतरी कर सकता है। निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किये जाने पर जश्न पूंजपति वर्ग के चाकरों के लिए छोड़कर संघर्ष के लिए कमर कसनी चाहिए।

  • फासीवादियों और प्रतिक्रियावादियों के एजेण्डे को आगे बढ़ाता फैसला

    Date:23 Aug 2017

    आखिरकार देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलमान औरतों को उनके जुल्मी पतियों से मुक्ति दिला दी, उस सर्वोच्च न्यायालय ने जिसने बामुश्किल सप्ताह भर पहले अखिला उर्फ हादिया मामले में यह कहा था कि चैबीस साल की लड़की या औरत अपने बारे में फैसला करने में सक्षम नहीं है। यही नहीं संघी फासीवादियों के सुर में सुर मिलाते हुए उसने ‘लव-जिहाद’ के लिए प्रयासरत आई एस आई एस के बारे में जांच का भी आदेश देश आखिरकार देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलमान औरतों को उनके जुल्मी पतियों से मुक्ति दिला दी, उस सर्वोच्च न्यायालय ने जिसने बामुश्किल सप्ताह भर पहले अखिला उर्फ हादिया मामले में यह कहा था कि चैबीस साल की लड़की या औरत अपने बारे में फैसला करने में सक्षम नहीं है। यही नहीं संघी फासीवादियों के सुर में सुर मिलाते हुए उसने ‘लव-जिहाद’ के लिए प्रयासरत आई एस आई एस के बारे में जांच का भी आदेश देश की सर्वोच्च आतंकवाद विराधी एजेन्सी को दे दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने 22 अगस्त को तीन-दो से फैसला सुनाया कि एक ही समय तीन बार तलाक कह दिया जाने वाला तलाक अवैध है और मुसलमान औरतों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है। असहमत जजों ने भी यह कहा कि सरकार को छः महीने के भीतर एक कानून बनाकर इस तलाक को अवैध घोषित करना चाहिए। पिछले छः महीने से संघी फासीवादियों समेत सारे मुस्लिम विरोधी प्रतिक्रियावादी इस मुद्दे को इस तरह उछाले हुए हैं मानों यह मुसलमान औरतों की सबसे बड़ी समस्या हो। इनकी इस हरकत से इस्लामी प्रतिक्रियावादियों को भी खूब मौका मिला इस बात को प्रचारित करने का कि इस्लाम खतरे में है। इस तरह इस मुद्दे को उछालकर दोनों तरह के प्रतिक्रियावादी एक-दूसरे को खाद-पानी देते रहे। जो संघी फासीवादी अपने समाज की औरतों को मध्ययुगीन पिंजरे में कैद कर देना चाहते हैं, वे मुसलमान औरतों के खैरख्वाह बन कर सामने आये और उनकी प्रतिक्रिया में मुस्लिम कट्टरपंथी अपने समाज के रक्षक के रूप में। हद तो तब हो गयी जब यशोदाबेन को भरी जवानी में बिना औपचारिक संबंध-विच्छेद किये छोड़ देने वाला शख्स तीन तलाक की शिकार मुसलमान औरतों के लिए रोता नजर आया। अब संघी फासीवादियों की इस मुहिम में सर्वोच्च न्यायालय भी अपना सुर मिलाने लगा है। एक के बाद एक उसके फैसले प्रतिक्रियावादी एजेण्डे को बढ़ाते लग रहे हैं। एक चैबीस साल की औरत के बुनियादी अधिकारों की ऐसी-तैसी करने वाला सर्वोच्च न्यायालय एक अन्य मामले में ठीक उसी भावना से फैसला दे रहा है। इस सब में आश्चर्य की कोई बात नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय समाज से परे नहीं है। जब समाज में प्रतिक्रियावादी और फासीवादी हावी हो रहे हों तो सर्वोच्च न्यायालय भी उनके सुर में सुर मिलायेगा ही और उन्हें वैधानिकता प्रदान करने वाला फैसला देगा। जहां तक मुसलमान समेत सारी औरतों का सवाल है, उनकी आजादी के लिए न केवल धर्म को पूर्णतया निजि मामला बनाने की जरूरत है बल्कि पूंजी के निजाम के खात्मे की भी जरूरत है। इसके बिना औरतों की बराबरी और आजादी की सारी बातें या तो भांति-भांति के प्रतिक्रियावादियों के एजेंण्डे को आगे बढ़ाने के लिए हैं या फिर संघर्षरत औरतों को बेवकूफ बनाने के लिए। मजदूर क्रांतिकरियों को इसी बात को जोर-शोर से स्थापित करना चाहिए।

महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में सेमिनार

प्रिय साथी, मजदूर वर्ग के सच्चे हितैषियो, मजदूर वर्ग की मुक्ति एवं शोषण विहीन-वर्गविहीन, न्यायपूर्ण व बराबरी पर टिके समाज की कामना करने वालों के लिए महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति एक महान विरासत व अमूल्य थाती है। इस वर्ष पूरी दुनिया में मुक्तिकामी-परिवर्तनकामी लोग महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी मना रहे हैं। महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति 20वीं सदी की ही नही वरन मानव सभ्यता की सबसे महान क्रांति थी। इस क्रांति ने एक नए युग का आगाज किया था- पूंजीवाद, साम्राज्यवाद के खात्मे का युग, शोषण विहीन समाज का युग, संपत्ति पर आधारित गैर बराबरी की समाज व्यवस्था के खात्मे का युग। इस क्रांति के फलस्वरूप रूस में मजदूर वर्ग का राज स्थापित हुआ। धरती के एक हिस्से पर युगों-युगों से चले आ रहे गुलामी के बंधनों का खात्मा हुआ। कालांतर में समाजवादी राज्यों का एक संघ- सोवियत समाजवादी प्रजातंत्र संघ संक्षेप में सोवियत संघ बना। सोवियत संघ पूरी दुनिया के मजदूरों की विश्व पूंजीवादी व्यवस्था से विजित भूमि था। सोवियत संघ ने मानव समाज में व्याप्त तमाम समस्याओं व अपराधों को जड़मूल से समाप्त कर धरती पर एक नये स्वर्ग की कल्पना को साकार किया। सोवियत राज्य ने बेरोजगारी, नशाखोरी, भुखमरी, वेश्यावृत्ति जैसी समाजिक समास्याओं को जड़मूल से खत्म कर इन्हें इतिहास की चीज बना दिया था। निशुल्क व समान शिक्षा-स्वास्थ्य से लेकर हर व्यक्ति को गरीमामय रोजगार व समाजिक सुरक्षा सोवियत राज्य ने उपलब्ध करायी। मजदूर वर्ग की सत्ता के अंतर्गत सोवियत राज्य ने मजदूरों की सामूहिक सर्जना के रास्ते खोलकर विकास व उन्नति के वे मापदंण स्थापित किए जिनकी कल्पना किसी पूंजीवादी राज्य में नही की जा सकती है। महाकवि रविन्द्र टैगोर ने सोवियत संघ के बारे में अपने अनुभव को बयां करते हुए कहा ‘मैंने धरती पर स्वर्ग देखा है’। 1956 में सोवियत संघ व 1976 में चीन में पूंजीवादी पथगामियों द्वारा सत्ता पर कब्जा करने तथा मजदूर वर्ग की सत्ताओं के स्थान पर वहां पूंजीवादी पुनस्र्थापना करने के बाद दुनिया में कोई मजदूर राज या समाजवादी सत्ता नही बची। ऐतिहासिक विपर्यय के इस दौर में पूंजीपति वर्ग ने एक तरफ पूरी दुनिया के स्तर पर जहां मजदूर वर्ग पर नृशंश हमले शुरू कर दिए, मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न को चरम पर पहुंचा दिया वहीं पूंजीपतियों के भाड़े के बुद्धिजीवियों द्वारा मजदूर वर्ग के महान क्रातिकारी नेताओं पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया। ‘समाजवाद फेल हो गया’ के नारे के साथ पूंजीवादी व्यवस्था की अमरता की घोषणाएं की जाने लगीं। लेकिन पूंजीवाद के कभी खत्म ने होने वाले अपने अंतरविरोधों के चलते मरणासन्न पूंजीवाद की प्राणांतक बीमारियों के बार-बार प्रकट होने और ताजातरीन 2007-08 से जारी वैश्विक आर्थिक संकट के चलते उनकी खुशियां काफूर हो गयी। पूंजीवाद की अजेयता व अमरता का उनका भ्रम टूटने लगा और एक बार फिर कम्युनिज्म का भूत उन्हे सताने लगा है। यह अकारण नहीं है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान दुनिया भर में माक्र्स की ‘पूंजी’ की लोकप्रियता बढ़ गयी है और शासक वर्ग के लोग भी ‘पूंजी’ के पन्ने टटोलने लगे हैं। ऐसे में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति से प्रेरणा लेकर, उसकी उपलब्धियों को सहेजकर एवं उसकी कमियों-गलतियों से सबक लेकर 21वीं सदी में अक्टूबर क्रांति के नए संस्करण रचने तथा पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की चुनौति मजदूर वर्ग के समक्ष आन खड़ी हुई है। महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी के अवसर पर इन्हीं चिंताओं व सरोकारों से रूबरू होने के लिए इंकलाबी मजदूर केन्द्र 5 नवंबर रविवार को गुड़गांव में एक सेमिनार का आयोजन कर रहा है। जिसमें आप सभी साथियों से भागीदारी की अपेक्षा है। *सेमिनार* *'महान अक्टूबर क्रांतिः उपलब्धियां, सबक और चुनौतियां'* *5 नवंबर, रविवार* *प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक* *अग्रवाल धर्मशाला निकट रेलवे स्टेशन गुड़गांव(हरियाणा)* *नोटः हुड्डा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन से रेलवे स्टेशन के लिए 321 नंबर की बस लें।* *8285870597, 9540886678*

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