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  • प्लेखानोव: एक प्रखर मार्क्सवादी चिंतक

    प्लेखानोव: एक प्रखर मार्क्सवादी चिंतक

    रूस के पहले मार्क्सवादी संगठन के संस्थापकों में से एक थे प्लेखानोव। 29 नवंबर 1856 से 17 मई 1918 तक के अपने जीवनकाल में प्लेखानोव ने नरोदवाद से मार्क्सवाद तक की और फिर बोल्शेविक-विरोघ से क्रांति विरोध तक की यात्रा की। परंतु मजदूर क्रांति के विज्ञान को स्थापित करने एवं उसका प्रचार-प्रसार करने में उनका जो ऐतिहासिक योगदान रहा, उसके चलते वे जीवन पर्यंत एवं मृत्यु के बाद आज तक भी क्रांतिकारियों के बीच में एक ऊंचे कद की शख्सियत के रूप में स्थापित हैं। ज्यार्जी वैलेन्तिनोविच प्लेखानोव रूस के सबसे पहले मार्क्सवादी थे। वे अपने दौर के एक महान चिंतक और प्रचारक थे। 1880 और 1890 के दशकों में उन्होंने रूस एवं पूरी दुनिया को मार्क्सवादी सिद्धान्त एवं उसके इतिहास के बारे में शानदार कृतियां दीं। इन कृतियों में उन्होंने मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी विचारघारा को प्रस्तुत करने वाले कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के विचारों एवं शिक्षाओं की न सिर्फ रक्षा की बल्कि उन्हें समृद्ध किया एवं उन्हें व्याख्यायित एवं प्रचारित कर लोकप्रिय बनाया। मार्क्स और एंगेल्स जर्मनी के ऐसे बुद्धिजीवी थे जिन्होंने राजनीति, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र के क्षेत्रों में मजदूर वर्ग का पक्ष लेते हुए उस समय तक विश्व में प्रचलित विचारों एवं विचारघाराओं की समालोचना करते हुए मजदूर वर्ग की मुक्ति का क्रांतिकारी सिद्धान्त पेश किया था। दशकों की मेहनत, संघर्ष, अध्ययन, बहस-मुबाहसों से समृद्ध यही युगान्तकारी क्रांतिकारी सिद्धांत मार्क्सवाद, वैज्ञानिक समाजवाद, साम्यवाद (कम्युनिज्म) आदि के नाम से जाना जाता है और आज भी पूरी दुनिया के मजदूर वर्ग एवं उसके क्रांतिकारी संगठनों का मार्गदर्शन कर रहा है। इतिहास में अलग-अलग समाज व्यवस्थाओं (आदिम साम्यवाद, दास समाज, सामंती समाज, पूंजीवादी समाज) के विकास के विज्ञान को प्रस्तुत करने वाला मार्क्सवादी सिद्धान्त ऐतिहासिक भौतिकवाद कहलाता है। प्लेखानोव ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या की। इसके अलावा उन्होंने इतिहास में व्यापक आम जनता एवं व्यक्तियों (नेताओं) की भूमिका, अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे के अघिरचना (राजनीति, कानून, साहित्य, विचारघाराएं, नैतिकता, रीतियां...) के साथ संबंघों की मार्क्सवाद के आधार पर वैज्ञानिक जांच पड़ताल की। समाज परिवर्तन एवं विकास में विचारघाराओं के महत्व पर भी प्लेखानोव ने लिखा। दर्शनशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों के इतिहास एवं खासकर रूस में भौतिकवाद एवं दर्शनशास्त्र के इतिहास पर उनकी बेहतरीन कृतियां वैज्ञानिक विचारों एवं प्रगतिशील संस्कृति के विकास के संदर्भ में बहुमूल्य योगदान हैं। रूस की क्रांति के महान नेता लेनिन ने प्लेखानोव के योगदान के बारे में कहा था ‘‘अतीत में उनके द्वारा प्रदान की गयी सेवाएं अतिशय थीं। 1883 एवं 1903 के मध्य के बीस वर्षों में उन्होंने बड़ी संख्या में निबंघ लिखे खास कर अवसरवादियों, माखवादियों और नरोदवादियों के खिलाफ शानदार निबंघ लिखे।’’ प्लेखानोव द्वारा छोड़ी गयी समृद्ध दार्शनिक विरासत आज तक मार्क्सवादी सिद्धान्तों की रक्षा करने और प्रतिक्रियावादी (समाज के विकास को पीछे ले जाने वाली) पूंजीवादी विचारघारा के खिलाफ मजदूर वर्ग के संघर्ष में मददगार हैं। प्लेखानोव तम्बोव गुबेर्निया के गुदालोव्का नामक गांव में पैदा हुए थे। उनके पिता वैलेनितन पेत्रोविच प्लेखानोव कुलीन परिवार से थे, उनकी थोड़ी जायदाद भी थी। उनकी माता मारिया फ्योदोरोव्ना के विचार प्रगतिशील थे और अपने पुत्र पर उनका विशेष प्रभाव था। वोरोनेझ के एक सैनिक स्कूल से 1873 में शिक्षा पूरी करने के बाद प्लेखानोव ने कुछ माह तक पीटर्सबर्ग के कोन्स्तान्तिन कैडेट स्कूल में पढ़ाई की और फिर 1874 में खनन संस्थान में प्रवेश किया। 1876 में वे एक नरोदवादी संगठन में शामिल हो गए और उस ही वर्ष रूस के पहले राजनीतिक प्रदर्शन के संगठन में भागीदारी की। इसके बाद वे भूमिगत जीवन जीने लगे। नौजवान प्लेखानोव चेर्नीश्वेस्की और बेलीन्स्की के उत्साही प्रशंसक थे जिन्हें वे अपना आदर्श और गुरु मानते थे। वे बेलीन्स्की के लेखों की विचारघारात्मक समृद्धि से बहुत प्रभावित थे और चेर्नीशेव्स्की के नेक कामों और क्रांतिकारी नायकवाद से उन्हें प्रेरणा मिलती थी। यह आश्चर्यजनक नहीं था कि बाद में अपनी बहुत सी कृतियों को क्रांतिकारी जनवाद के इन रूसी प्रतिनिघियों-बेलीन्स्की, चेर्नीशेव्स्की, हरजेन और दोब्रोल्यूबोत को समर्पित किया उक्त जनवादी-क्रांतिकारी विचारकों से प्रेरणा ग्रहण करने वाले नरोदवादी आन्दोलन की रूस के क्रांतिकारी आन्दोलन में ऐतिहासिक भूमिका रही है। 1870 के दशक में रूस की अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद जड़ जमाने लगा था। जहां एक तरफ पूंजीवाद अपने उद्योगों के माध्यम से श्रमिकों का शोषण करता था, वहीं देहातों में भी पूंजीवादी संबंध अपनी जड़ें उत्तरोत्तर जमाते जा रहे थे और अतीत के सामंती दासता के अवशेषों को हटाते जा रहे थे। गरीब किसानों की तबाही के साथ उनका उद्योगों के उजरती मजदूरों की वृहद बेरोजगार सेना में रूपांतरण होता जा रहा था। निरंकुशशाही के अघीन तत्कालीन रूस के देहातों में धीमी गति से पूंजीवाद प्रवेश कर रहा था। ऐसे में जमीदारों का प्रभुत्व भी देहातों से अभी समाप्त नहीं हुआ था। किसानों का बहुलांश सामंतवाद और पूंजी की दोहरी मार झेल रहा था। जमीदारों के खिलाफ किसानों के संघर्ष को क्रांतिकारी जनवादी नेतृत्व नरोदवाद ने दिया। अपने क्रांतिकारी जीवन के प्रारंभिक वर्षों में प्लेखानोव एक नरोदवादी सिद्धान्तकार के रूप में किसान क्रांति के माध्यम से समाजवाद में संक्रमण की संभावना में विश्वास रखते थे। पर साथ ही मजदूर वर्ग के लक्ष्य में भी उनकी बेहद दिलचस्पी थी। वे मजदूरों के अध्ययन चक्र संचालित करते थे, मजदूरों की सभाओं में भाषण देते थे, हड़तालों के आयोजन में मदद करते थे। मजदूर वर्ग का लेखों एवं परचों के माध्यम से लड़ाई के लिए आह्वान करते थे। प्लेखानोव के मजदूर वर्ग से घनिष्ठ संबंघों ने प्लेखानोव के लिए क्रांतिकारी आंदोलन में मजदूर वर्ग की भूमिका को समझना आसान बना दिया। उन्होंने मार्क्सवाद और पश्चिमी यूरोप के मजदूर आन्दोलन का गहन अध्ययन किया। इनकी मदद से वे मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका को स्पष्टतः समझने लगे और क्रांतिकारी सर्वहारा की विचारधारा को स्वीकारते गए। नरोदवादी किसानों के संगठित क्रांतिकारी संघर्ष के माध्यम से समाजवाद की स्थापना की बात सोचते थे। उनके द्वारा क्रांति के लिए किसानों को लामबंद करने के तमाम प्रयासों के असफल हो जाने के बाद नरोदवादियों ने आतंकवाद की कार्यदिशा को अपनाया। जनता की चेतना के विकास के माध्यम से क्रांति में जनता की निर्णायक भूमिका के महत्व को समझने में नरोदवादी अक्षम साबित हुए। इसके बजाय वे जनता को भीड़ समझते थे जो किन्हीं खास जागे हुए व्यक्तियों के साहसिक नायक (Hero) सदृश कारनामों को देखकर क्रांति के लिए उमड़ पड़ेगी। इसी आतंकवादी कार्यदिशा पर चलते हुए 1881 में नरोदवादियों ने अलेक्सान्द्र द्वितीय की हत्या कर दी। इसके बाद अलेक्सांद्र तृतीय के शासनकाल के साथ प्रतिक्रिया और दमन का जो काल शुरु हुआ उसमें क्रांतिकारी नरोदवादी आतंकवाद की उभरती लहर को कुचल दिया गया। 1890 के दशक में नरोदवाद क्रांति के मार्ग को छोड़कर जारशाही से समझौता करने वाली एक उदारवादी रुझान में पतित हो गया। प्लेखानोव ने अपने राजनीतिक मतभेदों के कारण नरोदवादियों को छोड़ दिया। वे नरोदवादियों की आतंकवादी कार्यदिशा के विपरीत जनता को आन्दोलित करने में विश्वास रखते थे। उन्होंने मात्र किसानों के क्रांतिकारी आह्वान की खोट को उजागर किया। वे 1877 और 1878 में दो बार अपनी क्रांतिकारी गतिविघियों की वजह से गिरफ्तार हुए और 1880 में बढ़ते मुकदमों ने उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया। तब से आगे उन्होंने विदेशों में रहकर ही रूस के लिए क्रांतिकर्म किया। 1882-83 तक वे पूरी तरह मार्क्सवाद को अपना चुके थे। पहला रूसी मार्क्सवादी संगठन-श्रम मुक्ति दल- जेनेवा में 1883 में प्लेखानोव, जासूलिच, एक्सेलरोद, ड्यूश एवं इग्नातोव ने स्थापित किया। इसका उद्देश्य मार्क्स एवं एंगेल्स की कृतियों के रूसी अनुवाद करके एवं मार्क्सवादी दृटिकोण से नरोदवाद की आलोचना करके वैज्ञानिक समाजवाद का प्रचार-प्रसार करना था। श्रम मुक्ति दल ने रूस में मार्क्सवादी क्रांतिकारी दल की स्थापना का सैद्धान्तिक आघार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और रूस के प्रगतिशील मजदूरों के मध्य राजनैतिक चेतना का सघन प्रसार किया। विदेशों में छपे श्रम मुक्ति दल के परचों एवं लेखों में रूस में पहली बार मार्क्सवाद को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया और मार्क्सवादी विचारघारा के आघार पर व्यवहारिक निष्कर्ष निकाले गए। मार्क्स और एंगेल्स के क्रांतिकारी विचारों के प्रसार को अपने जीवन का ध्येय बना लेने वाले प्लेखानोव फ्रांस, स्विट्जरलैण्ड और इटली में अपने प्रवास के दौरान मार्क्सवाद को लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत अधिक सक्रिय थे। वे भाषण देते थे और विविध विषयों पर परचे लिखते थे। 1882 में उन्होंने ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ का रूसी में अनुवाद किया। प्लेखानोव के गैरकानूनी रूप से रूस में लाकर वितरित किये गए लेख मजदूर वर्ग के लिए एक नयी ही दुनिया खोल देते थे, उनमें एक बेहतर भविष्य के लिए लड़ने का आह्वान होता था और मार्क्सवाद की बुनियादी बातों की शिक्षा सीधे, सरल, सबको समझ में आने वाले रूप में होती थी। मजदूर वर्ग के आदर्शों की अंतिम जीत में अडिग विश्वास से ओतप्रोत ये लेख यह आश्वस्त करते थे कि उन आदर्शों के मार्ग के सारे अवरोधों और कठिनाइयों को संगठित सर्वहारा आसानी से हटा देगा। 1880 के दशक के अंत से प्लेखानोव ने वैज्ञानिक समाजवाद के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में स्थान प्राप्त कर लिया। उन्हें एक महान सिद्धान्तकार और मजदूर वर्ग के आंदोलन के नेता के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति मिली। रूस के मार्क्सवादी क्रांतिकारी मजदूर संगठन (रूस की सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी) की ओर से मार्क्सवादियों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन(द्वितीय इण्टरनेशनल) में वे प्रतिनिधित्व करते रहे। उन्होंने जर्मनी, स्व्जिरलैण्ड, फ्रांस और इटली की पार्टियों के कामों में भी सक्रिय भागीदारी की। प्लेखानोव ने बाकूनिन के अराजकतावादी विचारों और उसकी दुस्साहसवादी कार्यदिशा की आलोचना की। उन्होंने बर्नस्टीन के सिद्धान्तों की आलोचना की जो मार्क्सवाद में कमियां निकालकर उसे गलत साबित करना चाहता था। उन्होंने मिलेरां, बिसोलाती और अन्य की आलोचना कर सही मार्क्सवाद को स्थापित किया। उन्होंने अर्थवाद और ”कानूनी मार्क्सवाद (जो मार्क्सवाद के नाम पर पूंजीवाद की सेवा करता था) के खिलाफ संघर्ष किया उन्होंने वैयक्तिक आतंकवादी रणकौशल को अपनाने वाले समाजवादी क्रांतिकारियों को भी बेनकाब किया। उन्होंने बताया कि मार्क्सवाद कैसे कल्पनावादियों(ओवेन, सेंट साइमन, फूरिये) और निम्न पूंजीवादियो(प्रूधों, नरोदवादी, अराजकतावादी एवं अन्य) के समाजवाद से भिन्न वैज्ञानिक समाजवाद की सर्वहारा क्रांतिकारी विचारधारा है। उन्होंने पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों-एडम स्मिथ एवं डेविड रिकारडो -के सिद्धान्तों के बरखिलाफ मार्क्सवादी अर्थशास्त्र कैसे सही है, पूंजीवादी अर्थशास्त्र एवं मार्क्सवादी अर्थशास्त्र का सामाजिक सारतत्व क्या है, इसकी व्याख्या की। उन्होंने मार्क्स की अतिरिक्त मूल्य एवं पूंजी संबंधी शिक्षा को व्याख्यायित किया। उन्नीसवीं सदी के अन्त में विश्व पूंजीवाद अपने विकास की नयी मंजिल साम्राज्यवाद में दाखिल हुआ। इस प्रकार शुरु हुए नए युग में क्रांतियां और युद्ध अनिवार्य थे। इस नए युग में सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टियों को भी अपनी समझ और कार्यप्रणाली का विकास करने की आवश्यकता थी। हालांकि प्लेखानोव अंतराष्ट्रीय स्तर पर मजदूर आंदोलन में एक सक्रिय शख्सियत बने रहे और मार्क्सवादी दर्शन की रक्षा में संलग्न रहे तो भी वे इस नए युग की विशेषताओं को समझ पाने में असफल रहे। न तो वे साम्राज्यवाद के संबंध में मजदूर आन्दोलन की सैद्धान्तिक समझ बढ़ा सके और न ही इस नए युग के मजदूर आन्दोलन के नए अनुभवों का ही कोई समाहार प्रस्तुत कर पाए। यह काम लेनिन के हिस्से में आया, जिन्होंने साम्राज्यवाद की समझदारी के साथ मार्क्सवाद को समृद्ध किया। 19वीं शताब्दी के अंत में प्लेखानोव के सबसे उत्साही समर्थकों में लेनिन थे। वे प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का संस्थापक मानते थे और उनके द्वारा शुरु किए गए क्रांतिकारी कर्म के प्रशंसक थे। लेनिन की पहलकदमी पर प्लेखानोव के श्रम मुक्तिदल समेत अन्य रूसी मार्क्सवादी धाराएं एक मंच (रूस की सामाजिक जनवादी पार्टी) के तले एकत्र हुयी थीं। प्लेखानोव भी इस एकता के हिमायती थे और 1900 में जब इसी एकता के उद्देश्य के साथ लेनिन ‘ईस्क्रा’ निकालने लगे तो प्लेखानोव ने भी इसमें लिखा और दोनों ने मिलकर सर्वहारा क्रांति और मार्क्सवाद का समर्थन किया और संशोधनवाद को बेनकाब किया। परंतु रूस की सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी की फूट (दूसरी कांग्रेस, 1903 के बाद) के समय लेनिन और प्लेखानोव आमने सामने खडे़ थे और फिर उनके सिद्धान्त कभी एक नहीं हुए। 1903 की कांग्रेस के बाद प्लेखानोव मेंशेविक हो गए। (पार्टी लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक और मारतोव के नेतृत्व में मेंशेविक दलों में बंट गयी थी।) उनके मेंशेविक में पतित होने और मार्क्सवादी सिद्धान्तों और व्यवहार में उनकी असंगतता के पीछे तत्कालीन पश्चिमी यूरोप में फलफूल रहे सुघारवाद की भी कम भूमिका नहीं थी। अब प्लेखानोव मेंशेविकों के समर्थक थे और मार्क्सवाद के निहायत ही महत्वपूर्ण सवालों पर वे मेंशेविक दृष्टिकोण के समर्थक बन गएः क्रांति में सर्वहारा की भूमिका और क्रांति की कार्यदिशा, किसानों के प्रति रुख, 1905 की क्रांति का मूल्यांकन, राज्य का प्रश्न, दर्शन के क्षेत्र में गंभीर सैद्धान्तिक गलतियां और ढेरों सवालों पर उनका सुसंगत मार्क्सवाद से विचलन, राजनीति में उनकी मेंशेविक पक्षघरता से संबद्ध था। मेंशेविक क्रांति में सर्वहारा वर्ग की नेतृत्वकारी भूमिका के खिलाफ थे। तमाम राजनैतिक संगठनात्मक सवालों पर मेंशेविक अवस्थिति के बावजूद प्लेखानोव ने पार्टी के विघटन के किसी भी रूप एवं प्रयास का विरोघ किया और पार्टी के बचाव के लिए विघटनवाद के खिलाफ संघर्षरत लेनिन का समर्थन किया। ऐसा उन्होंने 1909 से 1912 के मध्य किया। 1908 से 1912 तक लेनिन की तरह ही प्लेखानोव ने भी माखवादियों का पुरजोर विरोघ किया। प्लेखानोव ने क्रोसे (Croce), माख, ऐवेनेरियस, नीत्शे, विण्डेलवैण्ड, बर्गसन और तमाम अन्य बुर्जुआ दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों की तीखी आलोचना की और मार्क्सवाद की दार्शनिक बुनियाद की रक्षा की। परंतु 1912 के बाद प्लेखानोव दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से विघटनवादियों से एकता के समर्थक बन गए। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वे सामाजिक अंघराष्ट्रवादी अवस्थिति पर खड़े थे। समग्र साम्राज्यवादी विश्वयुद्ध की मुखालफत करने के बजाय वे जर्मनी की जीत में सर्वहारा वर्ग के लिए आपदा देखते हुए रूस की विजय को विश्व सर्वहारा के लिए बेहतर देखने लगे। जबकि दसियों लाख रूसी विश्वयुद्ध में मर रहे थे और लड़ाई से इन्कार कर रहे थे। प्लेखानोव ने विश्वयुद्ध का समर्थन किया। फरवरी 1917 में रूस में बुर्जुआ जनवादी क्रांति के बाद प्लेखानोव 37 वर्ष के विदेश प्रवास से वापस लौटे और पेत्रोग्राद गए। अपनी रूस वापसी पर वे तब तक पतित हो चुके द्वितीय इण्टरनेश्नल के सामाजिक सुघारवादी एवं सामाजिक अंघर्राष्ट्रवादी सिद्धान्तों (समाजवाद के नाम पर सुघारवादी एवं अंघराष्ट्रवादी सिद्धान्तों) के गुलाम बने रहे और रूस के तत्कालीन समाज के विकासक्रम को समझ पाने में निहायत अक्षम साबित हुए। उन्होंने केरेन्स्की की अस्थायी सरकार को यह कहते हए समर्थन दिया कि यह एक वास्तविक बुर्जुआ (पूंजीवादी) सरकार की स्थापना है जो रूस का पूंजीवादी विकास करेगी। इस विकास के परिणाम स्वरूप सर्वहारा वर्ग अपनी संख्या और शक्ति में आगे बढ़ेगा। तब समाजवादी रूपान्तरण की जमीन तैयार होगी और समाजवाद (मजदूर वर्ग का राज) आएगा। लेनिन के नेतृत्व में संचालित समाजवादी क्रांति पर उन्होंने हमला किया। इस क्रांति के भविष्य के मूल्यांकन के संदर्भ में वे पतित हो चुके द्वितीय इण्टरनेश्नल की रूढ़िवादी अवस्थितियों से चिपके रहे कि अभी रूस की आर्थिक परिस्थितियों के और अघिक परिपक्व होने की आवश्यकता है तभी समाजवादी क्रांति करनी चाहिए, तभी समाजवाद टिक सकता है। या कि समाजवाद में संक्रमण के लिए अभी कहीं ऊंचे सांस्कृतिक स्तर की आवश्यकता है, आदि,आदि। प्लेखानोव मानते थे कि फरवरी 1917 की क्रांति (पूंजीवादी जनवादी क्रांति) को रूस के पूंजीवादी विकास के लम्बे कालखण्ड का आरंभ होना चाहिए था। वे अक्टूबर 1917 की समाजवादी क्रांति को ‘‘इतिहास के सारे नियमों का उल्लंघन’’ मानते थे। परंतु जहां वे एक तरफ तत्काल रूस में एक समाजवादी क्रांति की आवश्यकता से इनकार करते रहे, वहीं वे विजय प्राप्त सर्वहारा वर्ग एवं उसकी सोवियत सत्ता के खिलाफ नहीं लड़े। मई 1918 में वे फिनलैण्ड में मृत्यु को प्राप्त हुए और उन्हें पेत्रोग्राद के वोल्कोवो कब्रगाह में बेलीन्स्की एवं दोब्रोल्यूबोव की कब्र के बगल में दफना दिया गया। इस प्रकार एक ऐसे शख्स का अन्त हुआ, जो अपनी गलत राजनैतिक, संगठनात्मक, रणकौशलात्मक और सर्वाघिक विचारघारात्मक अवस्थितियों के कारण रूस की महान बोल्शेविक पार्टी और इतिहास को रचने वाली मजदूर-किसान क्रांतिकारी जनता के खिलाफ खड़ा हो गया। इस शख्स के मेंशेविक बनने से यह पूरी प्रक्रिया गहराई के साथ जुड़ी थी। पर अपने जीवन के पहले के वर्षों में मार्क्सवादी सिद्धान्तों की रक्षा और प्रचार के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे और उनकी कृतियां भी मजदूर वर्ग की विचारघारा के अध्ययन और रक्षा में उपयोगी साबित होती रहेंगी।

महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में सेमिनार

प्रिय साथी, मजदूर वर्ग के सच्चे हितैषियो, मजदूर वर्ग की मुक्ति एवं शोषण विहीन-वर्गविहीन, न्यायपूर्ण व बराबरी पर टिके समाज की कामना करने वालों के लिए महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति एक महान विरासत व अमूल्य थाती है। इस वर्ष पूरी दुनिया में मुक्तिकामी-परिवर्तनकामी लोग महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी मना रहे हैं। महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति 20वीं सदी की ही नही वरन मानव सभ्यता की सबसे महान क्रांति थी। इस क्रांति ने एक नए युग का आगाज किया था- पूंजीवाद, साम्राज्यवाद के खात्मे का युग, शोषण विहीन समाज का युग, संपत्ति पर आधारित गैर बराबरी की समाज व्यवस्था के खात्मे का युग। इस क्रांति के फलस्वरूप रूस में मजदूर वर्ग का राज स्थापित हुआ। धरती के एक हिस्से पर युगों-युगों से चले आ रहे गुलामी के बंधनों का खात्मा हुआ। कालांतर में समाजवादी राज्यों का एक संघ- सोवियत समाजवादी प्रजातंत्र संघ संक्षेप में सोवियत संघ बना। सोवियत संघ पूरी दुनिया के मजदूरों की विश्व पूंजीवादी व्यवस्था से विजित भूमि था। सोवियत संघ ने मानव समाज में व्याप्त तमाम समस्याओं व अपराधों को जड़मूल से समाप्त कर धरती पर एक नये स्वर्ग की कल्पना को साकार किया। सोवियत राज्य ने बेरोजगारी, नशाखोरी, भुखमरी, वेश्यावृत्ति जैसी समाजिक समास्याओं को जड़मूल से खत्म कर इन्हें इतिहास की चीज बना दिया था। निशुल्क व समान शिक्षा-स्वास्थ्य से लेकर हर व्यक्ति को गरीमामय रोजगार व समाजिक सुरक्षा सोवियत राज्य ने उपलब्ध करायी। मजदूर वर्ग की सत्ता के अंतर्गत सोवियत राज्य ने मजदूरों की सामूहिक सर्जना के रास्ते खोलकर विकास व उन्नति के वे मापदंण स्थापित किए जिनकी कल्पना किसी पूंजीवादी राज्य में नही की जा सकती है। महाकवि रविन्द्र टैगोर ने सोवियत संघ के बारे में अपने अनुभव को बयां करते हुए कहा ‘मैंने धरती पर स्वर्ग देखा है’। 1956 में सोवियत संघ व 1976 में चीन में पूंजीवादी पथगामियों द्वारा सत्ता पर कब्जा करने तथा मजदूर वर्ग की सत्ताओं के स्थान पर वहां पूंजीवादी पुनस्र्थापना करने के बाद दुनिया में कोई मजदूर राज या समाजवादी सत्ता नही बची। ऐतिहासिक विपर्यय के इस दौर में पूंजीपति वर्ग ने एक तरफ पूरी दुनिया के स्तर पर जहां मजदूर वर्ग पर नृशंश हमले शुरू कर दिए, मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न को चरम पर पहुंचा दिया वहीं पूंजीपतियों के भाड़े के बुद्धिजीवियों द्वारा मजदूर वर्ग के महान क्रातिकारी नेताओं पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया। ‘समाजवाद फेल हो गया’ के नारे के साथ पूंजीवादी व्यवस्था की अमरता की घोषणाएं की जाने लगीं। लेकिन पूंजीवाद के कभी खत्म ने होने वाले अपने अंतरविरोधों के चलते मरणासन्न पूंजीवाद की प्राणांतक बीमारियों के बार-बार प्रकट होने और ताजातरीन 2007-08 से जारी वैश्विक आर्थिक संकट के चलते उनकी खुशियां काफूर हो गयी। पूंजीवाद की अजेयता व अमरता का उनका भ्रम टूटने लगा और एक बार फिर कम्युनिज्म का भूत उन्हे सताने लगा है। यह अकारण नहीं है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान दुनिया भर में माक्र्स की ‘पूंजी’ की लोकप्रियता बढ़ गयी है और शासक वर्ग के लोग भी ‘पूंजी’ के पन्ने टटोलने लगे हैं। ऐसे में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति से प्रेरणा लेकर, उसकी उपलब्धियों को सहेजकर एवं उसकी कमियों-गलतियों से सबक लेकर 21वीं सदी में अक्टूबर क्रांति के नए संस्करण रचने तथा पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की चुनौति मजदूर वर्ग के समक्ष आन खड़ी हुई है। महान अक्टूबर क्रांति की शतवार्षिकी के अवसर पर इन्हीं चिंताओं व सरोकारों से रूबरू होने के लिए इंकलाबी मजदूर केन्द्र 5 नवंबर रविवार को गुड़गांव में एक सेमिनार का आयोजन कर रहा है। जिसमें आप सभी साथियों से भागीदारी की अपेक्षा है। *सेमिनार* *'महान अक्टूबर क्रांतिः उपलब्धियां, सबक और चुनौतियां'* *5 नवंबर, रविवार* *प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक* *अग्रवाल धर्मशाला निकट रेलवे स्टेशन गुड़गांव(हरियाणा)* *नोटः हुड्डा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन से रेलवे स्टेशन के लिए 321 नंबर की बस लें।* *8285870597, 9540886678*

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